New Delhi : दिल्ली में शनिवार को हुए प्रदर्शनों और धरपकड़ के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने रविवार को एक विशेष सुनवाई की। शीर्ष अदालत ने सख्त लहजे में कहा कि देश में कानून के दायरे से बाहर किसी भी व्यक्ति को हिरासत में नहीं लिया जाएगा और नागरिकों की निर्बाध आवाजाही पर अकारण रोक नहीं लगाई जा सकती।
जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की दो-सदस्यीय पीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए अधिकारियों से मंगलवार तक अनुपालन रिपोर्ट और हिरासत में लिए गए सभी लोगों का विस्तृत ब्योरा तलब किया है।
सुप्रीम कोर्ट के 6 मुख्य निर्देश:
गैर-कानूनी हिरासत पर रोक: कानून द्वारा निर्धारित प्रक्रिया के अलावा किसी भी व्यक्ति को हिरासत में नहीं लिया जाएगा।
सार्वजनिक परिवहन बहाल रहे: जब तक बेहद जरूरी न हो, मेट्रो और रेल सेवाओं का संचालन सामान्य रूप से जारी रखा जाए।
बैरिकेडिंग की समीक्षा: कानून-व्यवस्था और यातायात को ध्यान में रखते हुए सड़कों पर लगाए गए बैरिकेड्स की तुरंत समीक्षा की जाए।
इंटरनेट सेवाएं: कानून के प्रावधानों के उल्लंघन के बिना इंटरनेट सेवाओं को बाधित नहीं किया जाएगा।
एकत्र होने का अधिकार: बीएनएसएस (BNSS) की धारा 163 के तहत प्रतिबंधित क्षेत्रों के बाहर आम नागरिकों को एकत्र होने की अनुमति होगी।
न्याय तक पहुंच: सुप्रीम कोर्ट या किसी भी अन्य अदालत में न्याय पाने के लिए व्यक्तिगत रूप से पहुंचने से किसी को नहीं रोका जाएगा।
TMC सांसद और वकीलों ने दायर कीं याचिकाएं
अदालत के समक्ष तृणमूल कांग्रेस (TMC) की सांसद और वरिष्ठ अधिवक्ता मेनका गुरुस्वामी की ओर से बंदी प्रत्यक्षीकरण (Habeas Corpus) याचिका दायर की गई। इस याचिका में ममता बनर्जी, अरविंद केजरीवाल, पिनराई विजयन और माणिक सरकार जैसे चार पूर्व मुख्यमंत्रियों सहित कई प्रमुख विपक्षी नेताओं को एहतियातन हिरासत में लेने की कार्रवाई को चुनौती दी गई है।
दूसरी तरफ, अधिवक्ता शैलेंद्र मणि त्रिपाठी ने अदालत की अवमानना याचिका दायर करते हुए दिल्ली पुलिस आयुक्त अनुराग कुमार और डीएमआरसी (DMRC) अध्यक्ष पर सुप्रीम कोर्ट के आदेशों की अवहेलना का आरोप लगाया है। याचिका में कहा गया है कि अदालती रोक के बावजूद शनिवार को प्रदर्शनकारियों को रोकने के लिए दिल्ली मेट्रो के 45 स्टेशनों के प्रवेश द्वार बंद कर दिए गए थे।
इसके अलावा, राजद (RJD) सांसद मनोज झा और अधिवक्ता अमन प्रसाद की याचिकाओं का भी उल्लेख किया गया, जिसमें पुलिस पर निहत्थे नागरिकों, महिलाओं और पत्रकारों के खिलाफ बल प्रयोग तथा 6,000 से अधिक लोगों को अवैध हिरासत में रखने के गंभीर आरोप लगाए गए हैं।



