नई दिल्ली (12 अक्टूबर 2026): चीन के विशाल बाजार में भारतीय सेवा क्षेत्र (Service Sector) की हिस्सेदारी बढ़ाने के लिए केंद्र सरकार ने एक बड़ी रणनीतिक कवायद शुरू की है। वाणिज्य मंत्रालय चीन में भारतीय सर्विस एक्सपोर्टर्स को होने वाली व्यावहारिक और प्रशासनिक दिक्कतों की विस्तृत सूची तैयार कर रहा है। इसका मुख्य उद्देश्य सख्त लाइसेंसिंग, रजिस्ट्रेशन, वीजा नियमों और डेटा लोकलाइजेशन जैसी गैर-टैरिफ बाधाओं (Non-Tariff Barriers) की पहचान कर उन्हें दूर करना है।
चीन में भारतीय आईटी व डिजिटल सेवाओं के लिए विशाल संभावनाएं
आंकड़ों के अनुसार, चीन हर साल लगभग 300 अरब डॉलर की सेवाओं का आयात (Service Import) करता है, लेकिन इसमें भारत का हिस्सा महज 8.95 अरब डॉलर (वर्ष 2024 के आंकड़े) के आसपास है। भारतीय फर्में मुख्य रूप से इंफॉर्मेशन टेक्नोलॉजी (IT), ITes और डिजिटल सॉल्यूशंस के क्षेत्र में काम करती हैं, लेकिन चीन के कड़े स्थानीय नियमों के कारण अधिकांश कंपनियां सीधे क्लाइंट्स को एक्सपोर्ट करने के बजाय मध्यस्थ कंपनियों के जरिए काम करने को मजबूर हैं।
इन प्रमुख अड़ंगों पर सरकार ने मांगी इंडस्ट्री से रिपोर्ट
वाणिज्य विभाग ने भारतीय उद्योग जगत से निम्नलिखित क्षेत्रों में आ रही चुनौतियों की जानकारी मांगी है:
डेटा व साइबर सुरक्षा कानून: डेटा लोकलाइजेशन, साइबर सुरक्षा जरूरतें और क्रॉस-बॉर्डर डेटा ट्रांसफर पर रोक।
पेशेवर आवाजाही: वर्क परमिट, सख्त वीजा नियम और प्रोफेशनल क्वालिफिकेशन (योग्यता) की मान्यता से जुड़े मुद्दे।
टैक्स व रेमिटेंस: टैक्स, पेमेंट रेमिटेंस और सीधे कॉन्ट्रैक्ट हासिल करने में आने वाली दिक्कतें।
वैश्विक बाजार में भारत का बढ़ता कद
वैश्विक कमर्शियल सर्विस एक्सपोर्ट में भारत की हिस्सेदारी 2014 के 3% से बढ़कर 2024 में 4.3% हो गई है। वहीं, महामारी के बाद भारत के सर्विस एक्सपोर्ट की ग्रोथ रेट बढ़कर 14% तक पहुँच गई है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि चीन में सर्टिफिकेशन और डेटा प्रोटेक्शन कानूनों (भारत का DPDP एक्ट और चीन का PIPL लॉ) से जुड़े मुद्दों को सुलझा लिया जाए, तो भारतीय कंपनियों के लिए व्यापार के नए दरवाजे खुलेंगे।



