पटना, बिहार / (रिर्पोट-बुशरा खातून -12 अक्टूबर 2026) : मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग और स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) के खिलाफ प्रस्तावित ‘जंतर-मंतर 2.0’ प्रदर्शन ने देश की राजधानी में बड़ी राजनीतिक और प्रशासनिक हलचल पैदा कर दी है। कॉकरोच जनता पार्टी (CJP), युवा संगठनों और छात्र समूहों द्वारा बुलाए गए इस आंदोलन को दबाने और रोकने के लिए दिल्ली पुलिस सहित अर्धसैनिक बलों की भारी तैनाती की गई है, जिसने लोकतंत्र में नागरिकों के मौलिक अधिकारों पर बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है।
दिल्ली छावनी में तब्दील: सुरक्षा या नागरिकों की घेराबंदी?
प्रदर्शन को देखते हुए दिल्ली पुलिस के साथ CRPF, BSF, SSB, ITBP, CISF और रैपिड एक्शन फोर्स (RAF) जैसे केंद्रीय बलों की अभूतपूर्व तैनाती की गई है। जंतर-मंतर और लुटियंस दिल्ली को चारों तरफ से सील कर दिया गया है।
मेट्रो स्टेशनों के प्रवेश-निकासी द्वार बंद किए जाने, कई ट्रेनों के मार्ग में बदलाव और सड़कों पर कड़ी बैरिकेडिंग से आम जनता बेहाल है। नौकरीपेशा लोगों, विद्यार्थियों, मरीजों और दिहाड़ी मजदूरों को भारी दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है। सवाल यह उठ रहा है कि क्या शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन को नियंत्रित करने के नाम पर पूरी राजधानी को ठप कर देना जायज है?
चुनाव आयोग की निष्पक्षता और SIR पर गहराया विवाद
प्रदर्शनकारियों का आरोप है कि स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) की आड़ में देश भर में लाखों वैध मतदाताओं के नाम मतदाता सूची से जानबूझकर हटाए गए हैं। सीजेपी और अन्य संगठनों की मांग है कि मुख्य चुनाव आयुक्त नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए अपने पद से इस्तीफा दें।
लोकतंत्र में चुनाव आयोग जैसी संवैधानिक संस्था की निष्पक्षता और जनता का विश्वास ही उसकी असली ताकत होती है। कथित अनियमितताओं पर आयोग की चुप्पी और दमनकारी नीतियां संस्थागत पारदर्शिता पर गंभीर सवाल उठाती हैं।
संपादकीय टिप्पणी: असहमति को सुनना ही जिम्मेदार शासन
भारतीय संविधान देश के हर नागरिक को कानून के दायरे में रहकर शांतिपूर्ण ढंग से विरोध दर्ज कराने का अधिकार देता है। सरकार और प्रशासन की ताकत हजारों जवानों की तैनाती में नहीं, बल्कि जनविश्वास और संवैधानिक मर्यादाओं में निहित होती है। जनता को सिर्फ वोट देने तक सीमित नहीं रखा जा सकता; उसे सवाल पूछने और असहमति व्यक्त करने का पूरा अधिकार है। विरोध की आवाज दबाने के बजाय उसे सुनना ही परिपक्व लोकतंत्र की पहचान है।



