New Delhi (17 अक्टूबर 2026): सुप्रीम कोर्ट ने देश में बच्चों के इंटरनेट इस्तेमाल पर उम्र के आधार पर पूरी तरह प्रतिबंध लगाने की मांग को सिरे से खारिज कर दिया है। शीर्ष अदालत ने ऐतिहासिक टिप्पणी करते हुए कहा कि बच्चों को भी इंटरनेट का इस्तेमाल करने का मौलिक अधिकार है। हालांकि, कोर्ट ने ऑनलाइन यौन शोषण से बच्चों की सुरक्षा (CSAM) के लिए सख्त व्यवस्था बनाने और आपत्तिजनक सामग्री को तुरंत हटाने का निर्देश दिया है।
उम्र आधारित प्रतिबंध से बढ़ेगा खतरा: सुप्रीम कोर्ट
जस्टिस की पीठ ने सुनवाई के दौरान चेतावनी दी कि अगर उम्र के आधार पर इंटरनेट पर पाबंदी लगाई गई, तो बच्चे अनजान और अधिक जोखिम भरी वेबसाइटों का रुख कर सकते हैं। प्रतिबंध के डर से बच्चे ऑनलाइन दुर्व्यवहार या किसी के बहकावे में आने पर माता-पिता से शिकायत करने में भी हिचकेंगे।
‘राष्ट्रीय डेटाबेस’ तैयार करने के निर्देश
आपत्तिजनक सामग्री को हटाने में हो रही देरी पर गहरी चिंता व्यक्त करते हुए शीर्ष अदालत ने कहा कि डिजिटल प्लेटफॉर्मों की सुस्त कार्रवाई का अब और इंतजार नहीं किया जा सकता।
परसेप्चुअल हैश तकनीक: केंद्र सरकार को एक राष्ट्रीय डेटाबेस तैयार करने का निर्देश दिया गया है, जो ‘परसेप्चुअल हैश’ (डिजिटल फिंगरप्रिंट) और URL का उपयोग करके विभिन्न सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर मौजूद एक जैसी आपत्तिजनक सामग्री की स्वचालित पहचान कर उसे हटाएगा।
सत्यापन की व्यवस्था: अदालत ने स्पष्ट किया कि केवल एक शिकायत के आधार पर किसी कंटेंट को हटाने या डेटाबेस में डालने से पहले उचित जांच और सुरक्षा उपाय होने चाहिए।
प्राथमिक स्कूलों से दी जाएगी साइबर सुरक्षा शिक्षा
सुप्रीम कोर्ट ने प्राथमिक कक्षाओं से ही बच्चों को इंटरनेट सुरक्षा और ऑनलाइन खतरों के प्रति जागरूक करने पर जोर दिया है, ताकि बच्चे बिना किसी डर के साइबर अपराध का सामना होने पर मदद मांग सकें।


