New Delhi (15 अक्टूबर 2026): सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को एक बेहद महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए साफ कर दिया है कि हिंदू धर्म छोड़कर इस्लाम या किसी अन्य गैर-हिंदू धर्म को अपनाने वाला व्यक्ति धर्म परिवर्तन से पहले के सामाजिक पिछड़ेपन के आधार पर आरक्षण का लाभ पाने का हकदार नहीं है। शीर्ष अदालत ने मद्रास हाईकोर्ट के उस फैसले को पूरी तरह बरकरार रखा, जिसमें कहा गया था कि धर्म परिवर्तन के बाद पुराने सामाजिक दर्जे का दावा नहीं किया जा सकता।
‘संविधान के अनुच्छेद 16(4) का दिया हवाला’
मामले की सुनवाई कर रही जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा और जस्टिस श्री चंद्रशेखर की पीठ ने स्पष्ट किया कि धर्म परिवर्तन के बाद किसी व्यक्ति को उसके पुराने धर्म के पिछड़ेपन के आधार पर नए धर्म के अधिसूचित पिछड़े वर्ग (Backward Class) में शामिल नहीं किया जा सकता।
अदालत ने संविधान के अनुच्छेद 16(4) का हवाला देते हुए कहा:
“आरक्षण का लाभ पाने के लिए संबंधित पिछड़े वर्ग की वास्तविक सदस्यता अनिवार्य है। केवल धर्म परिवर्तन से पहले की सामाजिक स्थिति के आधार पर किसी व्यक्ति को नए धर्म में स्वतः ही पिछड़े वर्ग का सदस्य नहीं माना जा सकता।”
‘हिंदू, सिख या बौद्ध धर्म के अलावा SC दर्जा नहीं’
सुप्रीम कोर्ट ने संविधान (अनुसूचित जाति) आदेश, 1950 के पैराग्राफ 3 का उल्लेख करते हुए दोहराया कि हिंदू, सिख या बौद्ध धर्म के अलावा किसी अन्य धर्म को मानने वाले व्यक्ति को अनुसूचित जाति (SC) का सदस्य नहीं माना जा सकता।
‘घर वापसी’ पर भी स्वतः नहीं मिलेगा पुराना आरक्षण
शीर्ष अदालत ने फैसले में एक और महत्वपूर्ण कानूनी बिंदु स्पष्ट करते हुए कहा कि यदि कोई व्यक्ति धर्म परिवर्तन के बाद पुनः हिंदू धर्म अपना लेता है (घर वापसी करता है), तो उसे अपने पुराने पिछड़े वर्ग का दर्जा और आरक्षण का लाभ स्वतः ही प्राप्त नहीं हो जाएगा। इसके लिए स्थापित कानूनी व सामाजिक प्रक्रियाओं का पालन करना अनिवार्य होगा।



