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लखनऊ: ‘वन बॉन्ड, वन सैलरी’ की मांग पर सड़कों पर उतरे यूपी के बॉन्डेड डॉक्टर

UP Bonded Doctors Protest
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Lucknow/ UP (15 अक्टूबर 2026):  उत्तर प्रदेश के सरकारी मेडिकल कॉलेजों और अस्पतालों में कार्यरत बॉन्डेड डॉक्टरों (Bonded Doctors) का आंदोलन बढता जा रहा है। ₹1 लाख मासिक वेतन , ‘वन बॉन्ड, वन सैलरी’ की मुख्य मांग को लेकर शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन कर रहे दर्जनों बॉन्डेड डॉक्टरों को पुलिस ने हिरासत में ले लिया है। पुलिस की इस कार्रवाई के बाद डॉक्टरों में भारी रोष व्याप्त है, जिससे प्रदेश भर की स्वास्थ्य सेवाएं ठप होने का गंभीर खतरा पैदा हो गया है।

पुलिस कार्रवाई और डॉक्टरों को हिरासत में लिए जाने से आक्रोश

प्रत्यक्षदर्शियों और प्रदर्शनकारी डॉक्टरों के अनुसार, वे अपनी मांगों को लेकर शांतिपूर्ण तरीके से विरोध जता रहे थे और चिकित्सा शिक्षा विभाग व शासन को ज्ञापन सौंपने की तैयारी में थे। हालांकि, पुलिस प्रशासन ने सुरक्षा और कानून-व्यवस्था का हवाला देते हुए प्रदर्शनकारियों को हटा दिया और कई प्रमुख डॉक्टर नेताओं को हिरासत में ले लिया। डॉक्टरों का कहना है कि वे किसी भी प्रकार की हिंसा या अराजकता में शामिल नहीं थे, फिर भी पुलिस द्वारा उन्हें जबरन रोका गया।

क्या हैं डॉक्टरों की प्रमुख मांगें?

 

1- ‘वन बॉन्ड, वन सैलरी’ (समान काम – समान वेतन)

वेतन विसंगति दूर करना: प्रांतीय चिकित्सा सेवा (PMS) के नियमित डॉक्टरों और बॉन्डेड डॉक्टरों के कार्य के घंटे, ड्यूटी की जिम्मेदारियां और ओपीडी/इमरजेंसी का दबाव एक जैसा होता है। इसके बावजूद बॉन्डेड डॉक्टरों को उनसे काफी कम मानदेय मिलता है।

समान मानदेय की मांग: डॉक्टरों की मांग है कि ‘समान काम के लिए समान वेतन’ के सिद्धांत का पालन करते हुए उन्हें भी नियमित डॉक्टरों के बराबर पारिश्रमिक दिया जाए।

 

2- न्यूनतम ₹1 लाख मासिक मानदेय

सम्मानजनक वेतन: अन्य राज्यों और कई केंद्र शासित प्रदेशों में बॉन्डेड व रेजिडेंट डॉक्टरों को दिया जाने वाला मानदेय काफी बेहतर है।

₹1 लाख की सीमा: उत्तर प्रदेश के बॉन्डेड डॉक्टर मांग कर रहे हैं कि उनकी सेवा अवधि के दौरान न्यूनतम 1,00,000 रुपये प्रति माह मानदेय निश्चित किया जाए ताकि वे आर्थिक तंगी के बिना अपनी सेवाएं दे सकें।

 

3- पारदर्शी और व्यावहारिक बॉन्ड नीति (Bond Policy)

समय पर पोस्टिंग और स्पष्ट दिशा-निर्देश: एमबीबीएस या पीजी की पढ़ाई पूरी होने के तुरंत बाद बॉन्ड पोस्टिंग की प्रक्रिया पारदर्शी और बिना किसी देरी के पूरी की जाए।

अनिवार्य सेवा अवधि का सरलीकरण: बॉन्ड अवधि की शर्तों को अधिक व्यावहारिक बनाया जाए ताकि युवा डॉक्टरों के उच्च शिक्षा (PG/Specialization) और करियर के अवसरों में बाधा न आए।

 

4- कार्यस्थल पर बेहतर सुविधाएं और सुरक्षा

मूलभूत सुविधाएं: दूर-दराज के ग्रामीण या क्षेत्रीय अस्पतालों में तैनात बॉन्डेड डॉक्टरों को रहने के लिए आवास (Hostel/Accommodation), पीने का साफ पानी और बुनियादी चिकित्सा संसाधन उपलब्ध कराए जाएं।

सुरक्षा व्यवस्था: ड्यूटी के दौरान अस्पतालों में डॉक्टरों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए कड़े इंतजाम किए जाएं।

 

5- प्रदर्शनकारियों पर कार्रवाई की वापसी व दंडात्मक कदमों पर रोक

अधिकारों की रक्षा: शांतिपूर्ण तरीके से विरोध जताने और अपनी जायज मांगें रखने वाले डॉक्टरों पर पुलिस कार्रवाई या निलंबन/नोटिस जैसी दंडात्मक कार्रवाइयों को तुरंत रोका जाए और हिरासत में लिए गए डॉक्टरों को रिहा किया जाए।

 

‘शांतिपूर्ण सत्याग्रह’, लेकिन स्वास्थ्य सेवाओं पर पड़ सकता है असर

डॉक्टरों के प्रतिनिधियों का कहना है कि वे मरीजों की सुविधाओं को ध्यान में रखते हुए फिलहाल शांतिपूर्ण तरीके से अपना विरोध दर्ज करा रहे हैं और आपातकालीन (Emergency) सेवाओं को बाधित नहीं होने दे रहे हैं। हालांकि, डॉक्टरों ने चेतावनी दी है कि यदि उत्तर प्रदेश सरकार और चिकित्सा शिक्षा विभाग ने जल्द ही उनकी मांगों पर विचार नहीं किया, तो वे आंदोलन को तेज करने और ओपीडी (OPD) सेवाओं का बहिष्कार करने के लिए विवश होंगे।

 

स्वास्थ्य सेवाएं ठप होने की चेतावनी

पुलिस हिरासत की घटना के बाद रेजिडेंट और बॉन्डेड डॉक्टरों के संघों ने कड़ा ऐतराज जताया है। डॉक्टरों ने चेतावनी दी है कि यदि हिरासत में लिए गए उनके साथियों को तुरंत रिहा नहीं किया गया और शासन ने वार्ता के जरिए उनकी जायज मांगों का समाधान नहीं निकाला, तो वे आपातकालीन (Emergency) और ओपीडी (OPD) सेवाओं का पूर्ण बहिष्कार करने के लिए विवश होंगे। यदि डॉक्टर कार्य बहिष्कार करते हैं, तो प्रदेश के प्रमुख सरकारी मेडिकल कॉलेजों व अस्पतालों में मरीजों को भारी दिक्कतों का सामना करना पड़ सकता है।

शासन और विभाग का रुख

चिकित्सा शिक्षा एवं स्वास्थ्य विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों का कहना है कि वे डॉक्टरों की मांगों से अवगत हैं और इस विषय पर प्रशासनिक स्तर पर विचार-विमर्श किया जा रहा है। सरकार की ओर से डॉक्टरों से अपील की गई है कि वे वार्ता के जरिए समस्या का समाधान निकालें और मरीजों के हित में अपनी सेवाएं जारी रखें।

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